बातोँ ही बातोँ में कुछ ऐसे बात कर दी ... ख़याल आया क्यों नही इस तरह से सजाया जाए उन कुछ लब्सोंको
गुम सुम सी रेहती वो
सोचती रेहती चुपके वो
उनकी वो मुस्कान देख
हर वक्त रहता इंतज़ार
खोयी सी रेहती कहीं
वो दूर दुनिया से कहीं
चुपके से लबों पे लाकर
प्यारिसी हंसी मन लुबाथी
रेहता हर कोई देखने उन्हें
काश मिले इक जलक हसीं की
सोचते हैं नज़र चुराके उनसे
चुपके से आह भरा करते कोई
बोली सी उनकी वो अदाएं
उनका प्यारा सा चेहरे से
आँखें ना हटा पाये कई
हसीन इतनी हैं कोई कहीं
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