पैगाम... घड़ी ये इंतज़ार की... ए था बहुत दिन का सपना लिक्लू कुछ इस पैगाम पर .. देखते देखते उनका संदेस का रस्ता पैगाम ना आया पर ख़तम ना हैं इंतज़ार..
झिझक होती मन मैं हर पल
जब भी हम आते उस गली
बस इंतज़ार उनके पैगाम का
कब ले आए लबोंपे मुस्कान |
राह पे इस तरह से रुत मोडती
खुली पलकें टिकी ए नज़रें हमारी
चुपके से हवा किस मोड़ से ले आए
उनकी सान्सोंको समेटे अपने संग |
बिन बातोंसें समझाते उनको
कहते उन्हें मन की आँख से
राह देकते लेकर चोटी सी हथेली
कब आए प्यारा सा उन्का पैगाम |
कब गुजरे घड़ी ए इंतज़ार की
नम होनेको आयी ए आँखें
समझलो इस दिल की आवाज़
थमा दो हथेली में मन का पैगाम |
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