हम कर रहे थे ऐसे ही बातें उनसे ... किसी मोड़ पर आई बात... हमने केह दिया उनसे "तुम समजोगी नही" .. सोचा इन शब्दोंको इस तरह से पेश करूँ तो कैसे ...
करते बातें इतनी तुमसे
केहते मन की किताब से
हम थके नही कभी ऐसे
पर तुम समजोगी नही
दिल ए केहता तुमसे
मन से दूर ना जाऊँ
कितने पास हो इसके
पर तुम समजोगी नही
आपसे शुरू होती ए लम्हे
पल ए करदो हसीन तुम
मन में चोटी सी ए बात
छुपी तुम समजोगी नही
रुखने ना दो ऐसे थम से
धड़कने दो कुछ और सही
ख्वाहिश हे बस इतनी सी
पर तुम समजोगी नही
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